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लैंगिक पहचान और यौन रुझान: समझ का अधूरा इंद्रधनुष

चेन्नई। नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फैसले के पांच साल बाद भी समलैंगिकता, बाइसेक्शुअलिटी और ट्रांसजेंडर पहचान को लेकर सामाजिक समझ सी...

ByThinkIndia Global Bureau
Published On Aug 12, 2026
लैंगिक पहचान और यौन रुझान: समझ का अधूरा इंद्रधनुष
Representative Image [ThinkIndia Global]

चेन्नई। नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत सरकार के ऐतिहासिक फैसले के पांच साल बाद भी समलैंगिकता, बाइसेक्शुअलिटी और ट्रांसजेंडर पहचान को लेकर सामाजिक समझ सीमित है। LGBTQIA+ समुदाय के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती कानूनी स्वीकार्यता नहीं, बल्कि परिवार और समाज में अपनापन पाने की है। मनोचिकित्सकों के अनुसार, यौन रुझान और लैंगिक पहचान कोई ‘मानसिक बीमारी’ नहीं है, जैसा कि विश्व स्वास्थ्य संगठन और अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं।

पेरेंटिंग के क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव ‘अपने बच्चे को बिना शर्त स्वीकार करने’ की प्रक्रिया का है। जब कोई किशोर अपने माता-पिता के सामने खुलासा करता है, तो माता-पिता की पहली प्रतिक्रिया भय और इनकार होती है। “कहीं हमारी परवरिश में कमी रह गई” या “समाज क्या कहेगा” जैसे विचार सबसे पहले आते हैं। विशेषज्ञ बताते हैं कि इस समय माता-पिता को काउंसलिंग की उतनी ही आवश्यकता होती है जितनी बच्चे को। सहायता समूह जैसे ‘स्वीकार’ और ‘संगम’ इस दिशा में महत्वपूर्ण काम कर रहे हैं।

ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए यौन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच एक बड़ा मुद्दा है। हार्मोन थेरेपी और सर्जरी के इच्छुक ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को सरकारी अस्पतालों में सीमित सुविधाएं और निजी अस्पतालों में अत्यधिक खर्च का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, समलैंगिक और बाइसेक्शुअल पुरुषों और महिलाओं के लिए विशिष्ट यौन स्वास्थ्य संबंधी खतरे (जैसे एसटीआई की जांच का डर) अब भी अनदेखे रहते हैं। एक समावेशी स्वास्थ्य ढांचा, जहां डॉक्टर ‘नैतिक व्याख्यान’ देने के बजाय सुरक्षित सेक्स की सलाह दें, यह समय की मांग है।

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