सहमति की उम्र पर नए सिरे से बहस: संसदीय समिति ने 16 साल करने की सिफारिश की, बाल अधिकार कार्यकर्ता नाराज
सहमति की उम्र 18 से घटाकर 16 करने की सिफारिश, बाल अधिकार कार्यकर्ताओं का विरोध। जानें पूरा मामला और दोनों पक्षों की दलीलें। Think India News।

नई दिल्ली, 15 जुलाई 2026 (Think India News): देश में यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (POCSO) अधिनियम के तहत सहमति की उम्र को लेकर लंबे समय से चली आ रही बहस ने एक नया मोड़ ले लिया है। एक संसदीय स्थायी समिति ने अपनी रिपोर्ट में सहमति की उम्र मौजूदा 18 से घटाकर 16 वर्ष करने की सिफारिश की है। समिति का तर्क है कि 16-18 वर्ष के किशोरों के आपसी सहमति वाले संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर निकाला जाना चाहिए ताकि अनावश्यक आपराधिक मुकदमे न हों।
रिपोर्ट के पक्ष में तर्क:
समिति ने अपनी सिफारिश में कहा कि आधुनिक समय में किशोर शारीरिक और मानसिक रूप से जल्दी परिपक्व हो रहे हैं और वयस्कता की कानूनी परिभाषा के बीच यह विसंगति अन्यायपूर्ण है। कई देशों में सहमति की उम्र 15-16 वर्ष है। साथ ही, इससे POCSO अदालतों पर अनावश्यक मामलों का बोझ कम होगा।
विरोध की आवाजें:
हालाँकि, बाल अधिकार कार्यकर्ताओं और महिला संगठनों ने इस सिफारिश का कड़ा विरोध किया है। उनका कहना है कि 16 वर्ष की उम्र में बच्चे यौन शोषण और ग्रूमिंग के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। नोबेल शांति पुरस्कार विजेता कैलाश सत्यार्थी की संस्था 'बचपन बचाओ आंदोलन' ने एक बयान में कहा, "सहमति की उम्र कम करना बाल तस्करों और यौन अपराधियों को लाइसेंस देने जैसा होगा।" सोशल मीडिया पर #SaveAgeOfConsent18 हैशटैग के साथ अभियान शुरू हो गया है।
सरकार का रुख:
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने फिलहाल इस रिपोर्ट पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया है, और कहा है कि सभी पक्षों के विचार सुने जाएँगे।
